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۷۴۶۱.

روش شناسی معرفت در مثنوی مولانا با تکیه بر سنت و مشرب عرفانی(مقاله علمی وزارت علوم)

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تعداد بازدید : ۸۰۵ تعداد دانلود : ۸۰۴
از شرایط مهم و اساسی برای به کارگیری روشی علمی و هدفمند و برنامه محور در تحقیقات عرفانی تعیین و تبیین سنت و مشرب عرفانی اهل تصوف یا به تعبیر دیگر واکاوی اصول و فروع مبانی عرفان اسلامی است. روش شناسی معرفت یکی از ویژگی های اصلی سنت های عرفانی است که می تواند برگرفته از منابع مختلف نقل، عقل و کشف و شهود باشد. نویسندگان این پژوهش می کوشند ضمن بررسی بازتاب روش های نقلی و عقلی در مثنوی، اثبات کنند تنها روش متقن معرفت شناسی روش کشف و شهود است و دو شیوه دیگر زمانی ارزشمند است که با روش کشف و شهود مطابقت یابد. به بیان دیگر، مطابق سنت و مشرب عرفانی مولانا خداشناسی (معرفت الرب) وابسته به خودشناسی (معرفت النفس) است؛ بنابراین سالک با کاربرد ابزار مختلفِ شیوه شهودی می کوشد، پلّه پلّه و به تدریج میزان مواجید عرفانی خود را ارتقا دهد تا از خود و ماسوی الله بیرون آید و به خودشناسی رسد. این امر در مثنوی معنوی از مرتبه تزکیه نفس آغاز می شود و با عشق ادامه می یابد. سپس مراتب کمال آن در سکر و حیرت طی می شود تا سرانجام در مرتبه فنا این توفیق نصیب سالک شود؛ در این مرتبه سالک به کل از غیر خدا تهی می گردد و تنها به اختیار و اراده او حرکت می کند؛ بنابراین به مقصود و غایت نهایی خود یعنی توحید و معرفت الرب دست می یابد.
۷۴۶۲.

Семантический потенциал лексем рисковый, рисковой и рискованный в современном русском языке(مقاله علمی وزارت علوم)

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Наличие определенных устойчивых культурно-национальных представлений, своеобразных «ментальных картинок», похожих на наши или отличных от них, особенно ярко проявляется в учебной аудитории при изучении иностранного языка. Без непосредственного контакта с носителями языка источником знаний об их менталитете, национальном характере и культурных сценариях поведения является изучаемый иностранный язык. Риск считается базовым концептом общечеловеческой картины мира. Он рассматривается как одно из основных составляющих представлений человека о мире, о законах его существования и выживания в нем. Нет человека, который бы не рисковал. Принятие любого решения – это уже риск. Когнитивная схема восприятия риска строится на единстве противоположных смыслов: потенциальная возможность (угроза) – ее реализация (опасность); необходимость действия – бездействие (и надежда на счастливую случайность); положительное развитие (шанс, успех) – негативное развитие (неудача, неуспех). В докладе мы рассматриваем семантические преобразования лексемы риск и ее производных рисковый, рисковой и рискованный, которые отражают общие тенденции в современном русском языке.
۷۴۶۳.

Миграционная лингвистика: теоретико-методологические подходы к формированию направления(مقاله علمی وزارت علوم)

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В фокусе внимания исследователей миграционных процессов находятся различные аспекты предлагаемой тематики: политические, экономические, социологические, правовые, культурологические, психологические. В связи с этим и подходы к определению понятия «миграция» варьируются. Проблема заключается не только и не столько в дефиниции, а в определении и выявлении ключевых концептов миграционной лингвистики, таких как интеграция, аккультурация, идентичность. Отсутствие единой терминосистемы, а как следствие дивергентное использование концептов миграционной лингвистики в различных научных направлениях усложняют моделирование как миграционных процессов, так и их ключевых концептов. Объектом миграционной лингвистики становится не только модель динамических языковых процессов, не только модель миграционного дискурса, но и такие аспекты как мотивация, обстоятельства, факторы протекания миграции, последствия миграционных процессов. Каждый из названных аспектов может представлять самостоятельную сферу исследования.
۷۴۶۴.

Ориентальные страницы ранней поэзии В.В. Набокова(مقاله علمی وزارت علوم)

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В статье рассматривается проблема ориентализма в творчестве В.В. Набокова раннего русскоязычного периода. В связи с этим исследуются произведения, имплицирующие тему и образно-художественную специфику Востока, восточные аллюзии и реминисценции в стихотворениях русского писателя первого периода эмиграции. Актуальность исследования обусловлена необходимостью постановки и освещения проблемы ориентальных традиций в творчестве Набокова, так как его восточные образы, жанры, стилистика стали продолжением ориенталистики Пушкина, Шекспира, Гете, Бунина, Гумилева и, одновременно, новым словом в художественной интерпретации Востока ХХ века. Новизна исследования видится в том, что впервые в литературоведении поднимается проблема восточных традиций в ранней поэзии Набокова. Раскрывается специфика включения Набоковым восточных реминисценций в тексты своих произведений. Представлены результаты сопоставительного анализа «восточных» образов и ключевых лексем в произведениях Пушкина и Набокова, Гумилева и Набокова как поэтический диалог и перекличка поэтов. Выявляется значение этого диалога в построении поэтического мира Набокова.
۷۴۶۵.

نقد و بررسی تصحیح حدیقهالحقیقه به اهتمام محمدجعفر یاحقی و سیّد مهدی زرقانی(مقاله علمی وزارت علوم)

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جایگاه والای حد یقه الحقیقه در ادب فارسی موجب شده است تا پژوهش های فراوانی درباره آن انجام گیرد؛ با وجودِ این، مسائلی مانندِ پیچیدگی های زبانی، کاربرد اصطلاحات سایرِ دانش ها، کهنگی زبان، اشارات تاریخی و مذهبی و ساختار نامنظمِ منظومه موجب شده است گرهِ پاره ای از ابهاماتِ این اثر ناگشوده باقی بماند. در این میان نباید از نبودِ یک تصحیحِ مطلوب از حدیقه غافل بود؛ تصحیحی که می تواند با در نظر گرفتنِ تمام ساحت های این کتاب و هندسه ذهنی سنایی، نزدیک ترین متن به متنِ زمان او را در اختیارِ جامعه ادبی قرار دهد. این مسئله ای است که توجه پژوهشگران معاصر زبان فارسی را به خود جلب کرده است و از همین روست که در سده اخیر، پژوهش های چشمگیری در حوزه تصحیح یا شرح مشکلاتِ این منظومه انجام گرفته است. در این پژوهش که به شیوه توصیفی تحلیلی و با استفاده از منابع کتابخانه ای انجام می گیرد، جدیدترین تصحیحِ حدیقه بررسی و کاستی های آن برجسته خواهد شد. بایستگیِ پرداختن به سنایی و آثار او در ادب فارسی و همچنین اهمیت نقد و بررسیِ تصحیح های انجام گرفته از ضرورت های این پژوهش است. به نظر می رسد در تصحیحِ یاحقی و زرقانی، اتّخاذِ شیوه تصحیح به صورت نسخه اساس و همچنین انتخاب نسخه منچستر به عنوان نسخه اساس، موجبِ راه یافتنِ کاستی هایی در متن مصحَّح شده است که در این پژوهش، در چهار قالب کلی به آنها پرداخته خواهد شد. افزون بر این، مفهوم برخی از واژگان، عبارات، تعابیر و ابیات حد یقه الحقیقه نیز مشخص خواهد شد.
۷۴۶۶.

Герменевтика, лингвистика текста и извлечение актуальной для читателя информации из поэтического текста(مقاله علمی وزارت علوم)

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В статье рассматривается соотношение герменевтики и лингвистики текста. Герменевтика зародилась как учение об истолковании текстов, как правило древних, смысл которых трудно понять из-за их давности или из-за того, что источник недостаточно хорошо сохранился. При этом понимание скрытого смысла достигается изучением грамматического строя текста, историко-культурным комментированием, психологическими исследованиями и анализом формы произведения. В настоящее время герменевтика определяется как учение об интерпретации текста
۷۴۶۷.

سیمرغ سهروردی و نشانه-معنا شناسی سیّال

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«هدهد سیمرغ شده» سهروردی، برای نشانه شدن از مسیر پر پیچ و خم دال های زبان می گذرد و زیر تأثیر آن ها مدلول های جدیدی می آفریند. در گفتمانی که سهروردی از «هدهد سیمرغ شده» به دست می دهد، ما با گونه ای نشانه ای روبه رو هستیم که نه در جایگاه پرنده، که در جایگاه های متعدّد دیگری، بروز می کند که بررسی آن ما را به حوزه ساختار جانشینی زبانی وارد می کند. نگارنده در این مقاله، در پی آن است تا با روش تحلیلی-توصیفی به کارکردهای گفتمانی و فرهنگی، گذر از فضایی فیزیکی- کنشی به فضایی نمادین و استعلایی و تبیین ویژگی های نشانه-معنا شناسی داستان «صفیر سیمرغ» از سهروردی بپردازد. «هدهد» در نظام جانشینی به کار گرفته شده در گفتمان سهروردی، بر اثر تأثیر نوسانات مدلولی، آرام آرام از عنوان پرنده یا مرغ، فراموش شده، به نشانه ای معنادار تبدیل می شود؛ در حقیقت، «هدهد» در کنار «هدهد» بودن، همه چیز هست. چنین عملیاتی را که امکانِ گذر از گونه ای دالی به گونه ای مدلولی متکثّر و استعلایی را فراهم می سازد، سیر تکاملی نشانه در زبان می نامیم.
۷۴۶۸.

صلح و دوستی از دیدگاه مولانا

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واژه های صلح، دوستی و آشتی از آغاز تاریخ بشر تا کنون جزء پرکاربردترین واژگان به شمار آمده اند؛ چنان که درکتاب های آسمانی مانند قرآن مجید، انجیل، تورات و کتاب های عرفانی، فلسفی، حکمی و ادبی نیز به فراوانی از آن یاد شده و در اندیشه های عارفان، ادیبان، حکیمان، شاعران و عالمان گوناگون جا گرفته است. در ادبیّات عرفانی نیز، عارفان  به وصف کردن واژه های صلح و آشتی و دوستی اهمّیّت زیادی داده و در متون عرفانی خود، مکرّر انسان ها را به صلح و دوستی دعوت کرده اند. مولانا جلاالدین رومی یکی از این مهم ترین و معروف ترین عارفان قرن سیزدهم میلادی می باشد که با آثار گران بها و افکار ارزشمند عرفانی خود در همه جهان نور عرفانی، آشتی، و دوستی را پراکنده است. مولانا در آغاز مثنوی، وجود انسان را به نی ای مانند کرده که از نیستان و اصل خود جدا افتاده و به سبب این جدایی، فریاد شکایت سرداده است. پس انسان باید تلاش کند تا از قید و بندهای دنیایی ببُرد و سرانجام به اصل خود بازگردد. چنین انسانی در طول زندگی خود فردی بی آزار و صلح جو خواهد بود. با توجّه به این نکته،  نگارنده در این مقاله سعی کرده است نظر و اندیشه های مولانا  را در سروده هایش درباره صلح و دوستی بررسی کند.
۷۴۶۹.

معرفت شهودی از نظر مولانا

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از نظر عرفا کامل ترین راه شناخت حق تعالی، معرفت شهودی است. این نوع معرفت نه از راه تفکّر نظری بلکه با مشاهده حقایق و طیّ منازل و مقامات و ترک تعلّقات دنیوی و تهذیب نفس به دست می آید. این راه اگرچه راهی دشوار و سخت و خاصّ برخی انسان های مخلص است، امّا نسبت به روش برهانی و عقلی نزدیک ترین راه به هدف است. در این پژوهش برآنیم تا نظر مولانا را در مورد این مقوله به روش تحلیلی–توصیفی بیان داریم. برآیند تحقیق حاکی از آن است که مولوی نیز چون دیگر عرفا، قائل به مراتب در معرفت و شناخت است و شناخت شهودی را معتبرترین شناخت می داند که در آن سالک بدون هیچ واسطه ای خدا را به شهود قلبی خود می شناسد. وی شناخت عقلی و سپس حسّی را در مراتب بعدی می داند و آن ها را برای کسانی که به شناخت مراتب بالاتر دسترسی ندارند، معتبر و مجاز می داند. از دیدگاه مولانا، ابزار و وسیله معرفت شهودی، دل است. از نظر وی دلی که منظر و مظهر حضرت سبحان است، دل انسان کامل یا به تعبیری دل اولیا و انبیا است و توحید حقیقی، دیدار شهودی است و این نوع معرفت نسبت به خداشناسی که مبتنی بر استدلال و آفاق و انفس است، رجحان و برتری دارد
۷۴۷۰.

بررسی و ریشه شناسی افعال در کتیبه شاپور یکم

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این پژوهش به بررسی و ریشه شناسی ساختمان فعل در کتیبه ها با روش توصیفی–تحلیلی پرداخته و در آن تلاش شده است تا ساختار فعل و صرف و نحو و جایگاه آن در جمله با استناد به کتیبه ها شناسایی و بررسی شود. برای جمع آوری اطّلاعات، به روش کتابخانه ای و با استفاده از فیش برداری، به صرف و نحو فعل ها پرداخته شده است. برای بررسی بهینه ریشه شناسی و ترجمه صحیح کلمات از سروده های آن دوره یعنی دوره باستان استفاده شده تا نکات اساسی مورد نظر به درستی بیان شود. در این سروده ها فعل ها مشخّص شده و زمان آن مورد بررسی قرار گرفته است. در جمع آوری اطّلاعات که عمده ترین آن، بررسی و ریشه شناسی افعال در کتیبه شاپور یکم کعبه زردشت می باشد، به شباهت ها و تفاوت های افعال و سیر تحوّل آن از دوره باستان به فارسی میانه و پهلوی اشکانی پرداخته می شود. در این مقاله افعال در جملات کتیبه شاپور یکم در کعبه زردشت و صرف و نحو آن مورد ارزیابی قرار می گیرد. پژوهش نشان می دهد که فعل در فارسی باستان در گذر زمان به فارسی میانه دچار تغییراتی شده است. در تحوّل از ایرانی باستان به فارسی میانه و پهلوی اشکانی، دستگاه های فعلی نقلی، ماضی و آینده و ماده های فعلی آغازی، آرزویی و تشدیدی از میان رفته اند. تنها دستگاه فعلی معروف به مضارع تحوّل یافته و عمومیّت پیدا کرده است.
۷۴۷۱.

بررسی لحن پایدارانه تقابل عطار با صاحب منصبان دنیوی، در آینه منطق الطیر(مقاله علمی وزارت علوم)

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لحن، نحوه خواندن کلمات و جملات در قالب فضای متن است؛ منشأ آن باورهای فردی، جمعی و ویژگی های اخلاقی، روحی و روانی افراد است که با ویژگی های سبکی، فرم و ساختار شعر ترکیب می شود. عنصر لحن به عنوان یکی از مهم ترین عناصر فضاسازی و تاثیر بر مخاطب همواره مورد توجه بوده است؛ زیرا بیان کننده درونیات و عواطف نویسنده است و نویسنده باید بتواند طبق موضوع منتخب و به دور از تصنع، لحنی متناسب با نوشته خود را انتخاب کند. این پژوهش با شیوه توصیفی تحلیلی، ضمن معرفی لحن، انواع و نحوه شکل گیری آن، در نظر دارد لحن کلی عطار در تقابل با مقامات دنیوی را در آینه منطق الطیر بررسی و گونه های مختلف آن را معرفی کند. نتایج به دست آمده از این پژوهش نشان می دهد که حکایت ها به سبب گفتگومحوری، از مهم ترین عرصه های بروز لحن هستند؛ همچنین لحن آثار مختلف، متفاوت است. ممکن است لحن در دل یک اثر، تغییراتی داشته باشد. شاعر در سرودن منطق الطیر (یکی از مهم ترین آثار منظوم عرفانی ) لحن های متفاوتی را خلق کرده است، لیکن به طور کلی لحن اعتراضی، به ویژه اعتراض علیه حکام و سلاطین در آثار عطار بیشتر از سایر الحان مطمح نظر است. عطار در برابر اصحاب قدرت از انواع لحن اعتراضی، واعظانه، تحذیری و... استفاده کرده است که هر کدام از الحان به تفکیک تشریح خواهد شد.  
۷۴۷۲.

تأثیر مبانی فکری ابوالعلاء معری و خیّام بر سبک زندگی متعارض آن ها (با رویکرد فلسفه و اسطوره شناسی)(مقاله علمی وزارت علوم)

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ابوالعلاء معری و عمر خیام از شاعران برجسته زبان و ادبیات عربی و فارسی هستند که زمینه های تشابه فکری این دو شاعر نامی، بستر پژوهش های بسیاری بوده است. در این مقاله از تأثیر فلسفه، شعر و اسطوره بر سبک زندگی و زیست متعارض ابوالعلاء معری و عمر خیام سخن رفته است. پژوهش حاضر با روش تحلیلی تطبیقی ، در پی پاسخ به این پرسش است که با توجه به اشتراکات فراوان میان معری و خیام، چرا این دو شاعر سبک زیست کاملاً متفاوتی را برگزیده اند؟ علت و یا علل این تفاوت سبک زندگی در چیست؟ آیا می توان گفت این تفاوت برایند تغذیه تفکر این دو شاعر از خاستگاه و آبشخورهای متمایز فکری ایشان است؟ همچنین تلاش شده است تا با استناد به نظر افلاطون و کاسیرر، خاستگاه بدبینی های معری و خوش بینی های خیام بررسی شود. حاصل نتایج به دست آمده حاکی از آن است که به رغم اشتراکات فراوان میان معری و خیام، بدبینی و ناشاد زیستن معری، برخاسته از هویت شاعرانه و تفکر اسطوره ای این شاعر است؛ در حالی که منشأ خوش بینی، زندگی شاد و امیدوارانه عمر خیام نشأت گرفته از جهان بینی فلسفی و حکیمانه وی می باشد.
۷۴۷۳.

پژوهشی در قدمت و اصالت جنگنامه های محمد حنفیه(مقاله علمی وزارت علوم)

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محمدبن علی بن ابی طالب، مشهور به محمدبن الحنفیه، به طور ناخواسته تبدیل به شخصیت محوری شماری از فرقه های غالیانه و افراطی از تشیع اعتدالی شده است. نخستین این فرقه ها، فرقه ی کیسانیه است. فرقه های بعدی از این فرقه در مسایل عقیدتی الگو گرفته اند. آثار منظوم و منثور متعددی درباره ی سرگذشت داستانی محمد بن حنفیه در دست است که با عنوان کلی جنگ نامه های محمد حنفیه شناخته می شوند. نسخه های خطی این آثار بسیار متأخرند و حتی قراین موجود در متن آن ها نیز از روزگار صفوی فراتر نمی رود. با توجه به این نکته و نیز تحول های فرهنگی عصر صفوی، به گمان پژوهشگران، شکل گیری و رواج این گونه آثار معمولاً در عصر صفوی بوده است. با این حال، در متون تاریخیِ فرقه نگاری و ادبی کهن، شواهد و منقولاتی دیده می شود که پیشینه ی داستان های محمد حنفیه را به چند سده پیش از صفویان می رساند. جستار حاضر در پی بررسی این شواهد و دیرینگی آن ها خواهد بود. به نظر نویسندگان دستاورد فعالیت فرقه های غلات، در پیوند آن ها با فرهنگ و ادبیات عامیانه مشخص می شود.  
۷۴۷۴.

مقاله کوتاه: تصحیح و توضیح یک بیت از دیوان رودکی سمرقندی(مقاله علمی وزارت علوم)

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رودکی سمرقندی از جمله شاعران پیشگام و برجسته ی حوزه ی ادبی خراسان است. شعر رودکی به دلیل سادگی و روانی همواره توجّه بسیاری از شاعران هم عصر و دوره های بعد را به خود جلب کرده است. اشعار رودکی به سببِ اشتمال بر لغات کهن دری، سبک شاعری و اندیشه های وی، مورد توجّه پژوهشگران فارسی زبان در ایران، تاجیکستان و افغانستان قرار گرفته است. اگرچه دیوان رودکی در گذر حوادث روزگار به تاراج رفته و جز ابیات اندکی از آن به دست ما نرسیده است، برخی مصححان از جمله: براگینسکی، نفیسی، میرزایف و...، از اشعار پُرشمار این شاعر، مقدار بسیار ناچیزی را از لابه لای متون بیرون آورده اند که بسیاری از آن اشعار به دو یا چند شاعر دیگر نیز منسوب است. به همین دلیل بازیابی یا تصحیح بیت یا ابیاتی از رودکی، در این روزگار برای رودکی پژوهان و دوستداران اشعار وی  بسیار اهمیّت دارد. نگارندگان در پژوهش حاضر سعی دارند ایراد موجود در مصراع نخست این بیت رودکی را: چنان که اشتر ابله سوی کنام شده   ز مکر روبه و زاغ و ز گرگ بی خبرا          که گوشه چشمی به حکایتی از کلیله و دمنه دارد، بررسی کنند و درباره ی ضبط مصراع دوم نیز پیشنهادی ارائه دهند.  
۷۴۷۵.

بررسی علل بیان ناپذیری تجربه های عرفانی در مثنوی های عطّار(الهی نامه، منطق الطّیر، مصیبت نامه)(مقاله علمی وزارت علوم)

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ناتوانی واژه در بیان تجربه های عرفانی را بیان ناپذیری می نامند. دارندگان تجربه عرفانی آگاهی عرفانیِ خود را فراتر از حد فهم و تقریر می دانند. آنها بر این باورند که در این تجربه استعلایی، نوعی آگاهی از حقیقت و ادراک امور به عارف دست می دهد که حریمی ماوراء عقل دارد و به قالبِ بیان در نمی آید. در نزد عارفان، همواره بیانِ حقایق و مفاهیم عرفانی با موانعی همراه است که زبان را از شرحِ این احوال ناتوان می سازد. موانعِ موضوع، متکلم، کلام و مستمع از بارزترین این موانع است که سبب بیان ناپذیری حقایق بلند عرفانی می شود. عطّار نیشابوری نیز مانند دیگر عرفا در آثار خود به صورت های مختلف بیان ناپذیری تجربه های عرفانی را تبیین کرده و عملاً ناتوانی زبان را در بیان حقایق عرفانی نشان داده است. مسئله پژوهش حاضر واکاوی علل بیان ناپذیری تجارب عرفانی برای تبیین این موضوع است که زبان در بیان ناگفته های عرفانی چه مشکلی دارد که عرفا را در بیان این مدرکات درونی ناتوان می سازد. همچنین بازتاب و بسامد این موضوع بنیادی عرفانی در آثار عطّار نیشابوری چگونه است؟ در این جستار به روش توصیفی- تحلیلی این موانع و بازتابِ آنها در سه منظومه الهی نامه، مصیبت نامه و منطق الطّیر عطّار نیشابوری مورد بررسی قرار گرفته است. هر یک از این موانع با بسامدهای متفاوت مورد توجه عطّار بوده و مانعِ موضوع و متکلّم بیش از موانع دیگر در بیان حقایق و رموز الهی در زبان عطّار مشهود است.
۷۴۷۶.

بنیادهای زبان شناسی شناختی در دیدگاه های عبدالقاهر جرجانی(مقاله پژوهشی دانشگاه آزاد)

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زبان شناسی شناختی، ساختهای دستوری را مبتنی بر ساخت ذهنی می داند و معنی را در کانون توجه خود قرار می دهد و معتقد است: معنی از شناخت و ادراک انسان مستقل نیست و رمزگذاری زبان شامل عواملی چون گزینش، دیدگاه، کانون توجه، چارچوب بندی، شیوه های مقوله بندی، و جزء اینهاست و ساختار زبانی، بازتاب مستقیم شناخت است، یعنی یک عبارت زبانی خاص، به یک شیوه خاصِ مفهوم سازی یک موقعیت معین وابسته است؛ این دیدگاه بسیار به نظریه نظم عبدالقاهر شبیه است که می گوید: معنی سخن وقتی حاصل می شود که مطابق ترتیب و تألیف خاصّی که معانی مرتّب و منظّم در نفس و دل آدمی دارند، به فرمان عقل به الفاظ مرتب ریخته شود (جرجانی، 1374: 2). توجه به نقش شناختی زبان، اهمیت معنا، پیروی ساختارهای نحوی از ساختار معنای ذهنی و عواملی که زبان شناسان شناختی در رمزگذاری زبان مؤثر می دانند، در این سخن عبدالقاهر عیان است. با عنایت به اهمّیّت دیدگاه شناختی در زبان شناسی معاصر و به دلیل جامعیت و دقت دیدگاه های زبانی عبدالقاهر که در محافل علمی اهمّیّت فوق العاده ای یافته است، در این مقاله دیدگاه زبان شناسان شناختی را با دیدگاه های زبانی عبدالقاهر مقایسه و تحلیل کردیم و بدین نتیجه رسیدیم که هر دو زبان را یکی از قوای شناختی می دانند که منشأ تجربی، روانشناختی و نقش اجتماعی دارد. و دستور زبان پیرو معنا و مفهوم است و معنای زبان متأثر از نظرگاه، موقعیت و دانش فردی و کاربرد عینی آن است.
۷۴۷۷.

سنتی باستانی در نظام خانقاه (ریشه یابی قاعده «لا سلام علی الأکل»)(مقاله علمی وزارت علوم)

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تصوف مجموعه ای از اصول عقیدتی و آداب ظاهری است. بی شک هر دوی این ساحت ها با آیین هایی خارج از مرزهای تصوف در ارتباط بوده و از آنها تأثیر پذیرفته است؛ برای مثال، بسیاری از آداب ظاهری تصوف از آیین فتوت متأثر است. در این پژوهش به یکی از آداب ظاهری و رسوم خانقاهی پرداخته می شود که احتمالاً با آیین فتوت از مجموعه آداب ایران باستان به مجموعه آداب تصوف اسلامی وارد و در مراحل بعدی، حتی حدیث نبوی تصور شده است. براساس این سنت کهن، فرد از سخن گفتن در زمان غذاخوردن منع می شود. گرچه برخی از محققین ابوسعید ابوالخیر را مبدع احتمالی این سنت برشمرده اند، چنین سنتی در اساطیر و آموزه های مزدیسنایی، آداب ملوک ساسانی و آیین فتوت سابقه داشته است و به نظر می رسد پس از ظهور اسلام، با آیین فتوت به نظام خانقاه راه یافته است. با بررسی منابع زردشتی، فتوت نامه ها، متون صوفیه و غیره می توان سیر انتقال این سنت را از آداب ایران باستان به تصوف اسلامی پیگیری کرد. ریشه یابی چنین سنت هایی در میان آیین های دیگر، ما را در ترسیم تصویری روشن تر از شیوه شکل گیری نظام خانقاه یاری می کند.
۷۴۷۸.

تبیین جایگاه قابوس نامه در تاریخ اندرزنامه نویسی(مقاله علمی وزارت علوم)

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اندرزنامه نویسی و تعلیم در ادبیات، سنتی است که سابقه آن به ایران باستان می رسد. نقل تجارب عملی و حِکَم در قالب کلمات قصار، ضرب المثل و حکایات، در آن دوره به صورت گسترده رایج بوده است. این میراث گسترده به صورت های مختلف به دوره اسلامی منتقل شد و رفته رفته با عناصر اسلامی درآمیخت و بنا بر اقتضائات این دوران دچار تحولاتی شد. قابوس نامه یکی از اولین و مهم ترین متون اندرزنامه ای در ادبیات فارسی است که در مسیر این انتقال و تحولات قرار دارد. این مقاله در پی آن است تا با بررسی سبک و درون مایه قابوس نامه و مقایسه آن با اندرزنامه های پیشین و برخی اندرزنامه های معاصرش، آشکار کند این اثر چه نسبتی با سنت اندرزنامه نویسیِ پیش و پس از خود دارد. بررسی ها نشان داد بر اساس تعلق خاطر آل زیار و نویسنده قابوس نامه به ایران باستان و آشنایی این نویسنده با زبان پهلوی، این اثر در سبک و محتوا، قرابت بسیاری به سنت اندرزنامه نویسی پیشین دارد. برخلاف این امر صبغه اسلامی آن در مقایسه با اندرزنامه های معاصرش اندک و دور از انتظار است. ازاین رو قابوس نامه حامل میراث اندرزنامه ای پیشینیان در ادبیات فارسی است و مؤلفه ها و عناصر آن را در دوران اسلامی نمایندگی می کند.
۷۴۷۹.

همنشینی ادب حماسی و ادب تعلیمی در اسکندرنامه نظامی گنجه ای(مقاله علمی وزارت علوم)

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در گستره ادبیات جهان و ایران، آثار ادبی بر اساس اندیشه و محتوا به چهار قسم ادب حماسی، تعلیمی، غنایی و نمایشی تقسیم می شوند. برخی از متون ادبی، اعم از نظم و نثر، تک ژانری هستند؛ اما گاهی متونی ظهور یافته اند که ترکیبی از دو یا چند ژانر ادبی متفاوت بوده و با یکدیگر همنشین شده اند و از این رهگذر توانسته اند دستاوردهایی در تحقیقات متون ادبی فراهم سازند. از جمله همنشینی ژانرها، آمیختگی ادب حماسی و ادب تعلیمی است. ویژگی مشترک این دو ستیز با ناسازهاست: یکی در برون، دیگری در درون و سرانجام پی ریزی کننده یک جامعه آرمانی. در این پژوهش کوشیده ایم تا با تکیه بر مطالعات کتابخانه ای و به روش توصیفی تحلیلی مبتنی بر استقرا، به بازخوانی بیناژانری در دو گونه ادب حماسی و ادب تعلیمی در اسکندرنامه بپردازیم. از جمله اهداف این نوشته، تبیین ویژگی ها، وجوه افتراق و اشتراک این دو ژانر در اسکندرنامه است؛ نیز نقطه تلاقی آن دو در این اثر نمایانده می شود. از جمله دستاوردهای ترکیب ژانر حماسی و تعلیمی آن است که تکمیل کننده یکدیگرند. تکیه گاه ادب حماسی ( شرف نامه )، اغلب معطوف به اراده اما ادب تعلیمی ( اقبال نامه ) بر پایه عقل و معرفت استوار است. ادب حماسی، بر عینیت (تمشیت امور کشور) پای می فشارد و در مقابل، ادب تعلیمی بر ذهنیت (مفاهیم اخلاقی) اصرار دارد. علت غایی هر دو ژانر ادبی، بسترسازی صلح و آرامش است: یکی در بیرون (سطح آفاقی) و دیگری در درون (سطح انفسی) برای پایه گذاری مدینه فاضله مورد نظر نظامی گنجه ای.  
۷۴۸۰.

جستاری در شناخت مؤلف راستین مرزبان نامه تبری(مقاله علمی وزارت علوم)

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مرزبان نامه کتابی است مشتمل بر حکایت ها و تمثیل ها که مرزبان آن را به زبان قدیم تبرستان نوشت. در سال 598 ه .ق. محمدبن غازی ملطیوی و در نیمه نخست قرن هفتم، سعدالدین وراوینی آن را به فارسی برگرداندند و یکی از مهم ترین آثار ادب فارسی ساختند. اثری که با وجود ارزش و شهرت فراوان، همچنان در هویت نگارنده آن جای تردید است؛ عنصرالمعالی کیکاوس، صاحب قابوس نامه و ابن اسفندیار، صاحب تاریخ تبرستان، مؤلف مرزبان نامه را «مرزبان بن رستم بن شروین» می دانند اما سعدالدین وراوینی، مؤلف آن را «مرزبان بن شروین» ذکر می کند که داعیه سلطنت نداشت اما پدرش شروین همان پادشاه پنجم باوندیه کیوسیّه است. قدما و متأخرین نیز هریک نظراتی در این باب داده اند. پژوهش حاضر که به روش کتابخانه ای انجام شده، پس از تحلیل و نقد نظریات مطرح شده، با استناد به منابع تاریخ تبرستان به اثبات می رساند که گفته وراوینی در ذکر نام مؤلف مرزبان نامه درست است؛ نه قول عنصرالمعالی کیکاوس و ابن اسفندیار.

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